मूर्ति प्राण प्रतिष्ठा एक अत्यंत महत्वपूर्ण हिंदू अनुष्ठान है जिसमें मंदिर या तीर्थस्थल में देवता की मूर्ति (मूर्ति) की प्राण प्रतिष्ठा और स्थापना शामिल है। "प्राण प्रतिष्ठा" शब्द का अर्थ है "जीवन शक्ति की स्थापना", जो मूर्ति में दिव्य उपस्थिति के आह्वान का प्रतीक है, जो इसे एक मात्र मूर्ति से देवता के जीवित अवतार में बदल देता है।
दिव्य आह्वान: मूर्ति में दिव्य उपस्थिति को आमंत्रित करना, जिससे वह देवता का पवित्र और पूजनीय प्रतिनिधित्व बन सके।
स्थान को पवित्र करना: उस मंदिर या पूजा स्थल को शुद्ध और पवित्र करना जहां मूर्ति स्थापित की गई है।
पूजा को सुविधाजनक बनाना: भक्तों को उनकी पूजा और भक्ति के लिए एक भौतिक केन्द्र बिन्दु प्रदान करना, जिससे ईश्वर के साथ सीधा संबंध विकसित हो सके।
मूर्ति का रूपांतरण: इस अनुष्ठान में मूर्ति को एक निर्जीव वस्तु से आध्यात्मिक रूप से शक्तिशाली रूप में रूपांतरित किया जाता है, जिसके बारे में माना जाता है कि वह देवता के सार का प्रतीक है।
आध्यात्मिकता में वृद्धि: प्राण-प्रतिष्ठा से मंदिर का आध्यात्मिक वातावरण बढ़ता है, तथा यह पूजा और ध्यान के लिए एक पवित्र स्थान बन जाता है।
सामुदायिक और सांस्कृतिक महत्व: प्राण प्रतिष्ठा समारोह में अक्सर समुदाय शामिल होता है, जिससे एकता और सामूहिक धार्मिक उत्साह को बढ़ावा मिलता है।
संकल्प: पुजारी और भक्तगण अपनी मंशा बताते हुए, भक्ति और ईमानदारी के साथ अनुष्ठान करने की शपथ लेते हैं।
शुद्धि: मूर्ति और मंदिर परिसर को जल, दूध, शहद और घी जैसे पवित्र पदार्थों का उपयोग करके शुद्ध किया जाता है।
देवताओं का आह्वान: यह अनुष्ठान बाधाओं को दूर करने के लिए भगवान गणेश के आह्वान से शुरू होता है, इसके बाद विभिन्न देवताओं और तत्वों की प्रार्थना की जाती है।
न्यासा (स्पर्श और आह्वान): पुजारी मूर्ति के विभिन्न भागों को छूता है, देवता की उपस्थिति को मूर्ति में आमंत्रित करने के लिए विशिष्ट मंत्रों का जाप करता है। इस चरण को न्यासा के रूप में जाना जाता है, जहाँ दिव्य ऊर्जाओं का आह्वान किया जाता है और मूर्ति में स्थापित किया जाता है।
प्राण प्रतिष्ठा मंत्र: मूर्ति में देवता की प्राण शक्ति का आह्वान करने के लिए विशेष मंत्र और भजन पढ़े जाते हैं। ये मंत्र देवता और पालन की जा रही परंपरा के आधार पर अलग-अलग होते हैं।
हवन (अग्नि अनुष्ठान): एक पवित्र अग्नि समारोह आयोजित किया जाता है, जहाँ वैदिक मंत्रों का उच्चारण करते हुए अग्नि में घी, अनाज और अन्य पवित्र वस्तुएँ अर्पित की जाती हैं। इससे वातावरण शुद्ध होता है और आह्वान प्रक्रिया मजबूत होती है।
अभिषेकम (मूर्ति को स्नान कराना): मूर्ति को जल, दूध, दही, शहद और घी जैसे पवित्र पदार्थों से स्नान कराया जाता है, जो शुद्धिकरण और पवित्रता का प्रतीक है।
अलंकारम् (सजावट): मूर्ति को कपड़े, आभूषण, फूल और अन्य आभूषणों से सजाया जाता है, जिससे उसका दिव्य स्वरूप और अधिक बढ़ जाता है।
आरती और प्रसाद: यह अनुष्ठान आरती (प्रकाश के साथ एक औपचारिक पूजा) और सभी प्रतिभागियों को प्रसाद (पवित्र भोजन) के वितरण के साथ संपन्न होता है, जो देवता के आशीर्वाद का प्रतीक है।
दिव्य उपस्थिति: मंदिर या तीर्थस्थान में निरंतर दिव्य उपस्थिति और आशीर्वाद सुनिश्चित करता है।
आध्यात्मिक उत्थान: आध्यात्मिक वातावरण को बढ़ाता है, भक्तों के बीच शांति, भक्ति और कल्याण को बढ़ावा देता है।
सांस्कृतिक निरंतरता: सांस्कृतिक और धार्मिक परंपराओं को संरक्षित और बढ़ावा देना, सामुदायिक और सामूहिक आध्यात्मिकता की भावना को बढ़ावा देना।
शुभ दिन: प्राण प्रतिष्ठा समारोह आमतौर पर ज्योतिषीय विचारों के आधार पर चुने गए शुभ दिन पर किया जाता है ताकि अधिकतम लाभ सुनिश्चित हो सके। देवता को समर्पित त्यौहार और विशिष्ट दिन अक्सर पसंद किए जाते हैं।
मंदिर और तीर्थस्थान: यह अनुष्ठान मंदिरों, घरेलू तीर्थस्थानों या किसी अन्य पूजा स्थल पर किया जाता है जहां मूर्ति स्थापित की जानी हो।
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